महेश कुमार हरियाणवी | महेश कुमार की कविता | कवि महेश कुमार हरियाणवी | हरियाणा का कवि | महेंद्रगढ़ का कवि | युवा कवि रचनाएँ
👉कविताएँ: 4
👉परिचय: महेश कुमार हरियाणवी, लोकप्रिय मंच कवि
👉संपर्क: 9015916317
हिंदी युवा कवि महेश कुमार हरियाणवी जी की चंद कविताएँ इस प्रकार है:
हिंदी कविता: आकांक्षा
घर-घर हाथ तिरंगा हो
कष्ट मिटाती गंगा हो।
टोपी, पगड़ी ध्यान रहे
मूच्छों का सम्मान रहे।
उच्च-नीच का बैर न हो
बेटी बहनें गैर न हो।
भरी बाप की थाली हो
श्रमिक नहीं नाबालिग हो।
बिक ना जाए मान कहीं
अवसर हो नीलाम नहीं।
अपने-अपनों से रूठे ना
मतलब में रिश्ते टूटे ना।
शिक्षा बढ़ती जंग न हो
लुटती हुई तरंग न हो।
केसरिया का मान रहे
हरी-सफेद कमान रहे।
चक्र में ना पतंगा हो
जन मन मस्त मलंगा हो।
घर-घर हाथ तिरंगा हो
घर-घर हाथ तिरंगा हो।।
युवा कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेंद्रगढ़, हरियाणा
9015916317
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काव्य विश्लेषण
भारत की आकांक्षाओं, समसामयिकी और सम्प्रभुता को दर्शाती, महेश कुमार जी की कविता "आकांक्षा" एक बेहद प्रेरणादायक और समाजिक संदेश देने वाली रचना है, जो देशभक्ति, समानता, भाईचारा व शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ-साथ नैतिक-पतन, बेरोजगारी, बाल-मजदूरी, भेदभाव व साम्प्रदायिक दंगों जैसी बढ़ती विकराल समस्याओं पर कड़ा व सटीक प्रहार करती है।
कुल मिलाकर, यह एक संवेदनशील, प्रेरणादायक और विचारोत्तेजक रचना है जो पाठकों को समाजिक मुद्दों पर विचार करने और सकारात्मक परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है।
आमतौर पर ऐसी रचनाएँ बहुत कम पढ़ने की मिलती है।
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(कारगिल हिल पर कविता)
कारगिल की कहानी है, जो सबको सुनानी है।
लड़गये देखो वीर जवान
साँसे महकी खुशबू तान।
आतंकी से छीना सम्मान
बनगए मिट्टी की पहचान।
जा, दुश्मन बैठा था ऊँचा
कुंडली में शिखर समूचा।
हिन्द को सद् कतई न भाईं
दहके राख तलक न पाई।
गर्जन की निशानी है, जो सब को सुनानी है।।
रखते इरादे सैनिक नेक
शांति की कर पहल अनेक।
गर्दिश की जब आहट हो
घुटने सिंहों के दे टेक।
उस शहादत को शत नमन है
जिनसे सुरक्षित चमन है।
दुश्मन आज तलक न बोला
दहका था किन-किन चोला।
पत्थरों की जुबानी है, जो सब को सुनानी है।।
वो उग्रवादि पाक निशानी
साजिश ने बंदूक़े तानी।
भारत ने भी हार न मानी
विजयरथ की देख जवानी।
जलता देख दहकता शोला
रज हुआ भहरूपी चोला।
तिरँगा लहर लहर लहराया
वन्दे भारत मिलकर गाया।
साहस की रवानी है, जो सब को सुनानी है।।
युवा कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेंद्रगढ़, हरियाणा
9015916317
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हिंदी कविता: दर्पण
देख ले जहान आज
कल कैसा होएगा।
संचारित दुनिया में
अकेलापन रोएगा।।
बच्चा कहीं और पले
माता कहीं और हो।
कौन देगा ज्ञान ध्यान
पैसों की हिलोर हो।
अपनों की डोर जाएँ
अपने ही तोड़ जो।
सपनों के पीछे भागें
बोने हर मोड़ हो।
सिसकी दुलार वाली
फोन पर टोहेगा।
देख ले जहान आज
कल कैसा होएगा।।
जिस पे हो आस वही
पास नहीं आएगा।
राज-पाट पाके पास
खास बन जाएगा।
संबंधों के बंधनो में
हल्की-सी भेंट होगी।
महँगी-सी दुनिया में
सस्ती-सी रेट होगी।
दिल एक पाने को ही,
पाए दिल खोएगा।
देख ले जहान आज
कल कैसा होएगा।।
दिल जो भी नेक होगा
लाखों में एक होगा।
मतलबी दुनिया में
झूठा फरेब होगा।
पग पथ पर चले
बिन थक जाएगा।
उँगली पे दुनिया का
भार बढ़ जाएगा।
गुम होगा चैन कहीं
पलभर सोयेगा।
देख ले जहान आज
कल कैसा होएगा।।
तरंग के रंग, रंग
जीवन पे गाज हो।
बोलियाँ तो होंगी पर
नशीली रिवाज़ हो।
शोर चारों छोर होगा
भोर भी बेजोर हो।
सुरीली आवाज़ वाला
कड़वा कठोर हो।
पक्षी घट जाएंगे तो
वन राज खोएगा।
देख ले जहान आज
कल कैसा होएगा।।
युवा कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेंद्रगढ़, हरियाणा
9015916317
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काव्य विश्लेषण
कविता "दर्पण" एक गहरी और विचारोत्तेजक कविता है, जो आधुनिक समाज की समस्याओं और चुनौतियों को दर्शाती है। कवि ने कहा है कि आज के समय में अकेलापन, संबंधों की कमी, मतलबीपन, और झूठ बढ़ रहा है। कविता का मुख्य संदेश यह है कि हमें अपने समाज और जीवन को सुधारने के लिए काम करना चाहिए, और हमें अपने संबंधों को मजबूत बनाने और प्रकृति की रक्षा करने के लिए प्रयास करना चाहिए।
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हिंदी कविता: तोड़
चल कुछ कर ऐसा
कल बने कल जैसा।
बिता हुआ कल कभी
हाथ नहीं आएगा।।
अफ़सोस किसका है
मिला उसे जिसका है।
कोशिशों का तेरी तुझे
फल मिल जाएगा।।
खुद से ना खुद डर
बिकता क्यों मर मर
हार भी गया जो गर
कर जीत जाएगा।।
कितने ही चलते है
सपनों में पलते है
मुख सही ओर मोड़
तोड़ मिल जाएगा।।
कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेंद्रगढ़, हरियाणा।
काव्य विश्लेषण:
यह कविता जीवन के संघर्ष और प्रयासों के महत्व को दर्शाते हुए एक प्रेरणादायक और उत्साहवर्धन संदेस देती है।
कवि ने कहा है कि बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता, इसलिए हमें वर्तमान के साथ, जीवन में आगे बढ़ते हुए अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।
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कोई भी मासूम जगत में, रहें ना तन्हा न्यारे।
चल हाथ मिलाले प्यारे रे, चल हाथ मिलाले प्यारे।
भक्तिरस की कविता
हरिहरब्रह्म
भला करने ही वालों की,
भलाई याद करते है।
बचाने आप आएंगे,
यही फ़रयाद करते हैं।।
तुम्हीं हो लाज के साथी,
तुम्हीं हो दीप की बाती।
तुम्हीं से आस जीवित है,
तुम्हीं हर साँस के साथी।
तुम्हीं हो राह जीवन की,
तुम्हीं से चाह जीवन की।
तुम्हारे नाम से महके,
बहारें आप उपवन की।।
हुई जो भूल मिटाने को,
दया का दान करते हैं।
बचाने आप आएंगे,
यही फ़रयाद करते हैं।।
तुम्हीं हो भोज की थाली,
तुम्हीं मुस्कान के माली।
तुम्हीं हो प्रेम चंदा का,
तुम्हीं हो भोर की लाली।
तुम्हीं हो महकती वादी,
तुम्हीं हो शब्द संवादी।
तुम्हारी शरण में आकर,
मिटे हर पाप उन्मादी।
मिला सब ज्ञान जिनसे है,
उन्हीं का ध्यान करते हैं।
बचाने आप आएंगे,
यही फ़रयाद करते हैं।।
तेरा अरमान जीवन में,
रहे अहसान जीवन में।
बने हम पुष्प की डाली,
इसी इंसान जीवन में।
हमें है चाह बस तेरी,
चलेंगे राह बस तेरी।
दयानिधि आप हो स्वामी,
फ़िक्र जिसको सदा मेरी।
नए नव कल्प उगाने को,
ब्रह्म का ध्यान करते हैं।
बचाने आप आएंगे,
यही फ़रयाद करते हैं।
कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेन्द्रगढ़, 123029
+91-9015916317
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(दम)
उठते ही बोले सुन
पँछी ये गुनगुन।
बस सपने ना बुन
अब चलना हैं।
डर-डर-डर नहीं
डर के ना जड़।
लड़-लड़-लड़ तूँ
खुद से ही लड़।
उठ कर गिरना
गिर कर झरना।
चाहे कमजोर पर
पग धरना है।
बस सपने ना बुन
अब चलना हैं।।
रोकती ना राहें
टोकती ना राहें
कहीं छोड़ अधर मुख
मोड़ती ना राहें।
पथ में ही दम
पथ में ही हम
पथ में ही गम
कम करना है।
उठते ही बोले सुन
पँछी ये गुनगुन।
बस सपने ना बुन
अब चलना हैं।।
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साँच कहूँ सुन साथ चले सब,
बात यही सब को बतलाना।
जीवन में मतभेद नहीं रख,
द्वेष कहाँ तक है टिकपाना।
बादल भी कितना ठहरे नभ,
आखिर तो धरती पर आना।
मान भले मिल जा धन पाकर,
जीवन का सच भूल न जाना।।
(गाँव)
भूमिका:
आँखे मूंद के सज खड़े हो
उस मंजिल तक जाने को।
जिसकी छत बेताब बड़ी हैं
वापिस धरती पाने को।
(गाँवों पर कविता)
जज्बातों से गाँव बनें हैं
प्रकृति-से है यारी।
नभ में सूरज-चाँद तने हैं
मिट्टी लगती है प्यारी।
वक्त बसे इंसानों में जहाँ
मुस्काती चौपालें।
चौपट, हुक्का, ताश के संग
बिखरे रँग निराले।
*रे भाइयों, बिखरें है रँग निराले।
नार-नार से मिलकर गाती
मधुर भजन के गान।
बेटी और बेटों से बस्ती
ऊँची घर की शान।
भोर हुई पंछी बतलाएँ।
गज़ब है उनकी यारी।
डाल-डाल में चहक सुनो
बेशक बोली न्यारी।
श्वेत-श्वेत सी दूध की धारे
करती हैं गुणगान।
हरि-हरि सी पोषक सब्जी
ताज़ा जिनका खान।
रेत के रँग में साहस करता
खेलों से दिलदारी।
ताल ठोकता सैनिक बोला
गाँव से अपनी यारी।
जीवित रिश्तों का मान जहाँ
घर में चौखट आँगन।
स्वाद अनोखा देख यहाँ का
छाछ, दही ले माखन।
ओं ओ ओ ओं... छाछ दही संग माखन।
नारी-की कमर पे लटक रही
छम-छम करती ताली।
खेतों में क्या खूब खिली है
सपनों की हरियाली।
चारपाई पे बैठ सुनाएँ
किस्से अपने अपने।
सरकारी जॉब को ढूंढ रहे
परिवार के सपने।
आसमान को छू लेने की
पंख करें तैयारी।
जज्बातों से गाँव बनें हैं
प्रकृति-से है यारी।
कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेन्द्रगढ़, 123029
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ये भजन का माहौल तो नहीं है लेकिन बनाने की कोशिश करते है।
भजन
हम इंसान नादान है मालिक, तुम ही पार लगाना नैय्या।
बीच भँवर कहीं अटक न जाएँ, लाज बचाना नाथ खिवैया।।
हम दोषी हैं अवगुणधारी
सर पापों की गठरी भारी।
अरदास करें दर पे तुम्हारे
विनती सुनना आप हमारी।
कदम-कदम गहराए परछाई, राह दिखाना जगत रचैया।
बीच भँवर कहीं अटक न जाएँ, लाज बचाना नाथ खिवैया।।
हम घूम रहे बन व्यापारी
जेब में लेकर होशियारी।
आफ़त कष्टों की भारी है
नफ़रत से करते यारी है।
चित्त चंचल हो भटक रहा हैं, खन्न खन्न खन करे रुपया
बीच भँवर कहीं अटक न जाएँ, लाज बचाना नाथ खिवैया।।
हम नजरों के नज खोए है
खुद कर्मों के काँटे बोए है।
जीवन अब तो तेरे हवाले
हम भटको को राम बचाले।
बढ़ती जाए नहीं खुदगर्जी, माफी देना देख रवैया।।
बीच भँवर कहीं अटक न जाएँ, लाज बचाना नाथ खिवैया।।
कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेन्द्रगढ़, 123029
***
कुछ महत्वपूर्ण छंदों तक पहुँचने के लिए एक भूमिका तैयार करता हूँ।
भूमिका
रिश्तों की बुनियाद ने ही भुलाए।
किसको अपना कहें किसको पराएँ।
मतलब की दुनियां मतलब के साथी
मुश्किल घड़ी में लो भागे बराती।
बिरला कोई जो वचन को निभाएँ।
किसको अपना कहें किसको पराएँ।
रिश्तों की गरिमा को कैसे बचाएं।
किसको अपना कहें किसको पराएँ।
(बौखलाया)
कैसा ये जमाना आया
जन जन बौखलाया।
चाहता है कुछ और
कुछ बन जाता है।
सपने नीलाम हुए
जान के भी दाम हुए
मानव यहाँ पे खुद
मानव को खाता है।
डर नहीं अपनों का
अरमान सपनों का
बाप को पछाड़ बेटा
खुशियाँ मनाता है।
रीत मन भूल गया
प्रीत मन भूल गया।
विष का गुबार बन
झूम-झूम गाता है।।
कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेन्द्रगढ़, 123029
***
(दौर)
आया है ये वक्त कैसा
रक्त नहीं रक्त जैसा।
बेटा आज बाप को ही
अर्थ समझाता है।
चपर-चपर बोले
सुनता ना हौले-हौले।
जननी के सामने ना
सर को झुकाता है।
मौके की फ़िराक़ में है
सपनों की साख में है।
तिनका-सा ज्ञान लेके
सीने को फूलाता है।
धरती पे फैली बाहें
आसमान पे निगाहें।
खुद का ही भार लेके
उड़ नहीं पाता है।।
कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेन्द्रगढ़, 123029
***
(गजब खेल)
किसको कितना हासिल होता
कितनों ने कितना खोया।
गँगा यमुना खतरे ऊपर
खुद-से-खुद का तट धोया।
सरकारों की पोल खोलता
हर रोज गली का नाला।
हर बूँद-बूँद ऐसे गिरती हैं,
जैसे सड़कों पे भाला।
क्या? डेंगू का प्रकोप यहाँ,
है स्वच्छ भारत निशानी।
महज दिनों का खेल तमाशा,
कर हो लई बात पुरानी।
कुदरत की बारिश में पलती,
लो, देखो अजब कहानी।
कुदरत का हैं खेल निराला
सूखा सैलाब ज़ुबानी।
बोली कुर्सी भौहें चढ़ाके
अब माया खूब कमालेंगे।
जेबों में जितने नॉट घलेंगें
उतना ही काम संभालेंगे।
पीड़ित पीड़ित को पीट रहा
बदहाली देख पुरानी।
जनता के हिस्से में आती
बस हरदम यही कहानी।
कुदरत की बारिश में पलती,
लो, देखो अजब कहानी।
है कुछ आँखे सैलाब बनी
तो कुछ का सूखा पानी।।
कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेन्द्रगढ़, 123029
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(सिंह अवलोकन)
सच्चे-झूठों की दुनिया
दुनिया लूट रहा बण्यां।
बण्यां कर से बोझल है
बोझल है सारी दुनिया।
दुनिया देखे लाचारी
लाचारी है बीमारी।
बीमारी खुद पे भारी
भारी है जिम्मेदारी।
जिम्मेदारी को पाले
पाले मिलकर के बच्चे
बच्चे कल के है माली
माली बिन दुनिया खाली
खाली-खाली सी क्यारी
क्यारी सिंचे गी नारी।
नारी माँ, बेटी, बहना
बहना होती फुलवारी।
फुलवारी सा देश यहाँ
देश यहाँ है भेष यहाँ
यहाँ धरा तक पावन है
पावन है परिवेश यहाँ।
यहाँ स्वर्ग सी है दुनिया
दुनियां लूट रहा बण्यां।
बण्यां कर से बोझल है
बोझल है सारी दुनिया।
कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेन्द्रगढ़, 123029
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(अपनी दिवाली)
हर बार दिवाली आती है
दर दीवारें सज जाती हैं।
मन भूल न जाना तुम इसको
जल रात सवेरा लाती है।
बच्चे फुलझड़ियाँ लाते है
फिरकी से मन बहलाते है।
घर के पकते पकवान कहें
निर्धन का उच्चा मान रहें।
नीयत नित पुष्प खिलाती है
हर बार दिवाली आती है।।
मन भूल न जाना तुम इसको
जल रात सवेरा लाती है।।
बन मानव चुनले रंगों को
मर्यादि राम के ढंगों को।
मेचक को दीपक हरता है
मिट्टी में बीज सवरता है।
जब आस बचाई जाती है
हर बार दिवाली आती हैं।।
मन भूल न जाना तुम इसको
जल रात सवेरा लाती है।।
कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेन्द्रगढ़, 123029
***
कहीं लड़ना नहीं लड़ाई में
मत पड़ना गर्म कढ़ाई में।
मिले गुस्से में तो हल नहीं
जो टूट जा डौर तो बल नहीं।
सुन उसका कल बच पाएगा
जो खुद का दाना खाएगा।
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चेहरे पे कितने मरगए देखो
जन बनकर के मतवाले।
जाने किसको ढूँढ़ रहे अब
जीवन से हार उजाले।
***
है जीवन भी क्या दरिया साथी
चालक यहाँ पर बह जाते है।
पागल, मूर्ख, जग कहता जिनको
किनारों पे थपेड़े सह जाते हैं।
मिले आग भले तुम ना घबराना
ये अँगारे जलकर बुझ जाते है।
सच राख की भाँति उड़ना सबको
तेरे कर्म धरा पर पूजे जाते है।
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तारीफों को सुन-सुन कर
ईमान खुद मर जाएगा।
खंजर से टकराकर घाव
प्रशस्त बनता जाएगा।
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(भजन संगम)
अखिल जगत है खूला थामे, हीरा क़ीमती दाम का।
भूमि, गगन, पवन मिल बोलें, जीवन है वरदान का।।
1) नाथों के नाथ
नाथों के नाथ,
शिवजी का साथ
रहे सर हाथ बोलो। .....क्या?
जय बम बम भोले, घुंघरू बोलें
जटाएँ नीर नद, शीतल होले।
जय बम बम भोले, जय बम बम भोले।।
जय बम भोले..
तुम से बढ़कर कौन उमापत
तुम देवों के देव हो।
काल तुम्ही हो ढाल तुम्ही हो
तुम्हीं तो महादेव हो।2
तन के, मन के, रोम रोम के
कण कण के भंडारी हो।
ओम नाम में जगत समाया
दुनिया के बनवारी हो।2
खुशियों की बात
सावन का साथ
रहे सर पे हाथ बोलो।....
जय बम बम भोले, घुंघरू बोलें
जटाएँ नीर नद, शीतल होले।
जय बम बम भोले, जय बम बम भोले।।
तेरी महिमा, को जग हारा
झूम झूम के गाएगा।
तुम हो सागर, जीत के पावन
भवसागर तर जाएगा।
करुणा के करतार तुम्ही हो
भक्तों पे बलिहारी हो।
मंगल कारक नाम तुम्हारा
त्रि-नेत्र के धारी हो।
भक्ति की बात
भावों का साथ
रहे सर पे हाथ बोलो....
जय बम बम भोले, घुंघरू बोलें
जटाएँ नीर नद, शीतल होले।
जय बम बम भोले, जय बम बम भोले।।
दौड़ भाग के, थक कर चलकर
तेरे धाम पे आएगा।
जीवित रूप है नर और नारी
जीवन तुझको गाएगा।
तुम ही देव दयानिधि हो शिव
साहस के बलधारी हो।
अज्ञानी मूर्ख मानव है हम
रखना लाज हमारी हो।
ना मिलती मात
गरुओं की बात
रहे सर पे हाथ बोलो....
जय बम बम भोले, घुंघरू बोलें
जटाएँ नीर नद, शीतल होले।
जय बम बम भोले, जय बम बम भोले।।
जय बम भोले..
कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेन्द्रगढ़, 123029
9015916317
***
(श्याम भजन: मुरली बजाले)
चल मुरली बजाले, श्याम निराले
हम पापी बनें, किश्मत वाले।
रब, जग से हारे हम दुखियारे
भटक रहे कष्टों के मारे।
मन, कहता हैं अब प्रीत लगाले।
हम पापी बनें, किश्मत वाले।
कनक कहे तुम्हें दुनिया सारी
तुमसे बढ़कर कौन मुरारी।
मात-पिता और पालनकर्ता
जन-जन देखें राह तुम्हारी।
विष से अमृत बदले प्याली
मीरा की वो सुध मतवाली।
मन की यमुना बोल रही है
दर्श तो दे मष्तक के माली।
भक्तिभाव के तुम रखवाले
भक्तिभाव के ओ रखवाले
हम पापी बनें, किश्मत वाले।।
मदन महिमा का गुण गाएँ
किस्मत अपनी आप बनाएँ।
मुश्किल में ना चीर घटेगा
कतरा-कतरा रोज कमाएँ।
भक्ति का सही एक पता है
जन कर्मों का जन गवाह है।
शील कर्म विश्वास सबल हो
श्वास-श्वास में नाम अमल हो।
मन मानुस के हो उज्याले।
हम पापी बनें, किश्मत वाले।
रब, जग से हारे हम दुखियारे
भटक रहे कष्टों के मारे।
मन, कहता हैं अब प्रीत लगाले।
हम पापी बनें, किश्मत वाले।
कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेन्द्रगढ़, 123029
9015916317
***
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